Tuesday, 3 December 2013

• हल्दी : Turmeric


 इस दृव्य को सभी भारतीय , भोज्य पदार्थ के रूप में प्रयोग करते हैं आयुर्वेद में इसे औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं घरेलू उपचार में इसे प्रयोग करते हंर बाहरी उपचार में इसे प्रयोग करते हैं सूखी हल्दी का चूर्ण
• . हल्दी के विभिन्न भाषाओं में नाम संस्कृत : हरिद्रा , कांचनीं , वरवर्णिनीं , पीता बंगला : हलुद , हरिद्रा मराठी : हलद गुजराती : हलदर कन्नड़ : अरसीन तेलुगू : पासुपु फारसी : जरदपोप अरबी : डरूफुस्सुकुर English : Turmeric Latin : Curcuma Longa, Curcuma Domestica

• हल्दी के प्रकार हल्दी दो प्रकार की होती है , एक लम्बी तथा दूसरी गोल लम्बी हल्दी गोल हल्दी
• हल्दी परिचय :1 यह खेतों में बोई जाती है , लेकिन कई स्थानों में यह स्वयमेव उतपन्न हो जाती है जमीन के नीचे कन्द के रूप में इसकी जड़ें होती है ये कन्द रूपी जड़ें हरी अथवा ताजी अथवा कच्ची हल्दी होती है
• हल्दी परिचय : 2 कच्ची हल्दी की सब्जी बनाकर खाते हैं कच्ची हल्दी को सुखा लेते हैं या उबालकर सुखा लेते हैं , ऐसी हल्दी सूखने के बाद रंग परिवर्तन होकर पीला रंग ग्रहण कर लेती है
• हल्दी के रासायनिक तत्व हल्दी में कई प्रकार के रासायनिक तत्व पाये जाते हैं एक प्रकार का सुगंधित उडंनशील तैल 1 प्रतिशत एक प्रकार का गोंद जैसा पदार्थ एक प्रकार का पीले रंग का रंजक पदार्थ एक प्रकार का गाढा तेल

• कुछ आधुनिक तथ्य वैज्ञानिकों का कहना है कि हल्दी में लौह तत्व पाया गया है इसमें विटामिन बी ग्रुप के कुछ तत्व पाये गये हैं
• विश्लेषण में पाये गये तत्व - 1 हल्दी में पाये गये आवश्यक तत्व निम्न प्रकार हैं जल 13.1 % ग्राम प्रोटीन 6.3 % ग्राम वसा 5.1 % ग्राम खनिज पदार्थ 3.5 % ग्राम रेशा 2.6 % ग्राम कारबोहाइड्रेट 69.4 % ग्राम
• विश्लेषण में पाये गये तत्व - 2 कैल्शियम 150 मिलीग्राम प्रतिशत फासफोरस 282 मिलीग्राम प्रतिशत लोहा 15 मिलीग्राम प्रतिशत विटामिन ए 50 मिलीग्राम प्रतिशत विटामिन बी 03 मिलीग्राम प्रतिशत कैलोरियां प्रति 100 ग्राम में : 349 कैलोरी
• हल्दी के गुण -1 आयुर्वेद में हल्दी के गुणों का वर्णन कई ग्रंथों में मिलता है हल्दी स्वाद में चरपरी , कड़वी प्रभाव में रूखी और गर्म होती है यह कफ तथा पित्त दोषों को दूर करती है
• हल्दी के गुण -2 इसे त्वचा के रोग , वर्ण , प्रमेह , रक्त विकार , सूजन , पान्डु रोग और घावों के इलाज के लिये प्रयोग करते हैं आधुनिक शोधों से पता चला है कि हल्दी तमाम प्रकार के रोगों को दूर करनें में सहायक है
• हल्दी के बारे में आयुर्वेद विचार हल्दी तिक्त , कटु , उष्णवीर्य , रूक्ष , वर्ण्य , लेखन , कुष्टघ्न , विषघ्न , शोधन गुण युक्त है इसके प्रयोग से कफ , पित्त , पीनस , अरूचि , कुष्ठ , कन्डू , विष , प्रमेह , व्रण , कृमि , पान्डु रोग , अपची आदि रोंग दूर होते हैं
• हल्दी के बारे में आधुनिक विचार हल्दी के बारे में आधुनिक वैज्ञानिकों नें परीक्षण करके सिद्ध किया है कि यह कैंसर को बढ़नें से रोकती है यह गठिया जैसे रोंगों की पीड़ा को दूर करती है
• हल्दी की औषधीय मात्रा कच्ची हल्दी का रस : 1 से 3 चाय चम्मच तक सूखी हल्दी का चूर्ण : 1 ग्राम से 4 ग्राम तक यह वयस्क व्यक्ति के लिये निश्चित की गयी मात्रा है किशोंरों के लिये 500 मिलीग्राम से 1 ग्राम तक बच्चों के लिये 50 मिलीग्राम से 100 मिली ग्राम तक

• हल्दी की मात्रा इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं और हल्दी पूर्ण रूप से सुरक्षित औषधि है इसे आवश्यकतानुसार गुनगुनें पानीं , गरम चाय अथवा दूध के साथ दिन मे , तकलीफ के हिसाब से , एक बार से लेकर चार या पांच बार तक ले सकते हैं
• हल्दी के बाहरी प्रयोग - 1 त्वचा के रोगों में हल्दी का बाहरी प्रयोग करते हैं हल्दी का चूर्ण 1 ग्राम और आवश्कतानुसार दूध मिलाकर बनाया हुआ पेस्ट मुहासों , युवान पीडिका , सफेद दागों या काले दागों , रूखी त्वचा , काले रंग के त्वचा के धब्बे , खुजली , खारिश आदि तकलीफों में लगानें से आरोग्य प्राप्त होता है घाव , कटे एवं पके हुये , पीब से भरे घावों में हल्दी का चूर्ण छिड़कनें से घाव शीघ्र भरते हैं
• हल्दी के बाहरी प्रयोग -2 चाकू या धारदार अस्त्र से शरीर का कोई अंग कट जानें पर हल्दी का चूर्ण छिड़कनें से लाभ प्राप्त होता है बवासीर के मस्सों का दर्द अथवा जलन ठीक करनें के लिये हल्दी का चूर्ण मस्सों पर छिड़कना चाहिये
• हल्दी के बाहरी प्रयोग -3 चेहरे का सौंदर्य , त्वचा का सौंदर्य निखारनें के लिये हल्दी का उबटन प्रयोग करना चाहिये एलर्जी , शीतपित्ती , जलन का अनुभव , ददोरे आदि पड़ जानें की तकलीफ में हल्दी को पानी के साथ पेस्ट जैसा बनाकर लगानें से आराम मिलता है
• हल्दी के बाहरी प्रयोग -4 फोड़ा फुन्सी पकानें के लिये हल्दी की पुल्टिस रखनें से फोड़ा फुंसी शीघ्र पक जाते हैं शरीर के किसी भी स्थान की सूजन के साथ दर्द और जलन हो तो हल्दी के पेस्ट का बाहरी प्रयोग करनें से इन तकलीफों में आम मिल जाती है
• आंतरिक प्रयोग - जुखाम , खांसी , बुखार सभी प्रकार के बुखार , जुखामों और खांसियों में हल्दी का चूर्ण 1 से 3 ग्राम तक गरम पानीं से दिन में दो बार , सुबह शाम , खानें से आरोग्य प्राप्त होता है जुकाम , बुखार अथवा खांसी कैसी भी हो , नया हो अथवा पुराना , उक्त प्रकार से हल्दी का सेवन करनें से सभी अवश्य ठीक हो जाते हैं
• आंतरिक प्रयोग - साइनुसाइटिस नाक से संबंधित सभी तरह की तकलीफों , पुराना जुकाम , पीनस , नाक का गोश्त बढ़ जानें , साइनुसाइटिस में हल्दी का चूर्ण 1 से 2 ग्राम की मात्रा में दिन में दो बार खाने से आरोग्य प्राप्त होता है उक्त तकलीफों से होनें वाले सिर दर्द , बुखार , बदन दर्द आदि लक्षण ठीक हो जाते हैं
• आंतरिक प्रयोग - एलर्जी एलर्जी , शीतपित्ती या इसी तरह के लक्षणों और तकलीफों से परेशान रोगी हल्दी का चूर्ण , 1 से 2 ग्राम , सुबह और शाम , दिन में दो बार , आधा कप दूध और आधा कप पानी मिलाकर , इस प्रकार से पकाये दूध के साथ खानें से आरोग्य प्राप्त होता है दूध में यदि चाहें तो थोड़ी शक्कर स्वाद के लिये मिला सकते हैं

• इस्नोफीलिया इस्नोफीलिया में हल्दी का प्रयोग बहुत सटीक है 2 से 3 ग्राम हल्दी चूर्ण गुनगुनें पानीं से , दिन में तीन बार , खानें से इस रोग में आराम मिलती है कुछ दिनों तक लगातार खानें से रोग समूल नष्ट हो जाते हैं जैसे जैसे इसनोफीलिया का काउन्ट कम होता जाये , वैसे हल्दी की मात्रा अनुपात में घटाते जाना चाहिये
• दमा और अस्थमा में इस रोग में हल्दी का चूर्ण 2 से 3 ग्राम तक अदरख के एक या दो चम्मच रस और शहद मिलाकर दिन में चार बार खानें से आरोग्य प्राप्त होता है कुछ दिनों तक यह प्रयोग लगातार काना चाहिये अगर रोगी एलापैथी की दवायें खा रहा है , तो भी यह प्रयोग कर सकते हैं जैसे जैसे आराम मिलता जाय , एलापैथी दवाओं की मात्रा कम करते जांय
• यकृत प्लीहा की बीमारियों में यकृत की बीमारियों में हल्दी का उपयोग आदि काल से किया जा रहा है यकृत के सभी विकारों में , पीलिया , पान्डु रोग इत्यादि में हल्दी का चूर्ण 1 ग्राम , कुटकी का चूर्ण 500 मिलीग्राम मिलाकर दिन में तीन बार सादे पानीं के साथ खाना चाहिये प्लीहा की सभी बीमारियों में उक्त चूर्ण मिश्रण खाना चाहिये
• प्रमेह प्रमेह रोग से संबंधित सभी विकारों में हल्दी का उपयोग बहुत सटीक है बहुमूत्र , गंदा पेशाब , पेशाब में जलन , पेशाब की कड़क , पेशाब में एल्बूमेंन जाना , पेशाब में रक्त , पीब के कण आदि आदि रोगों में हल्दी चूर्ण 1 ग्राम दिन में चार बार सादे पानीं से सेवन करें अगर इन बीमारियों में कोई एलोपैथी की दवा खा रहे हों , तो उनके साथ हल्दी का उपयोग करें , शीघ्र लाभ होगा
• मधुमेह हल्दी 2 ग्राम , जामुन की गुठली का चूर्ण 2 ग्राम , कुटकी 500 मिलीग्राम मिलाकर दिन में चार बार सादे पानीं से खायें पथ्य , परहेज करें , कई हफ्तों तक औषधि प्रयोग करें मधुमेह के साथ जिनको पैंक्रियाटाइटिस , यकृत प्लीहा विकार , गुर्दे के विकार , आंतों से संबंधित विकार हों , ये सभी तकलीफें दूर होंगी

• शास्त्रोक्त प्रयोग हल्दी के शास्त्रोक्त प्रयोग बड़ी संख्या में आयुर्वेद के चिकित्सा ग्रंथों में मिलते हैं इनमें से बहुत से प्रयोग तमाम प्रकार की बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल किये जाते हैं
• सलाह अगर आप कोंई एलोपैथी की दवा खा रहे हैं या होम्योपैथिक या कोई अन्य उपचार कर रहे हैं , तो भी , आप हल्दी का प्रयोग कर सकते हैं हल्दी के प्रयोग करनें से , उपचार पर , कोई असर नहीं पड़ता है हल्दी के प्रयोग से , किये जा रहे उपचार , अधिक प्रभावकारी हो जाते हैं

चिरौंजी या चारोली -


- चिरौंजी या चारोली पयार या पियाल, प्रियाल नामक वृक्ष के फलों के बीज की गिरी है जो खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है।
- इसका प्रयोग भारतीय पकवानों, मिठाइयों और खीर व सेंवई इत्यादि में किया जाता है।
- चारोली वर्षभर उपयोग में आने वाला पदार्थ है जिसे संवर्द्धक और पौष्टिक जानकर सूखे मेवों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
- चारोली का वृक्ष अधिकतर सूखे पर्वतीय प्रदेशों में पाया जाता है। दक्षिण भारत, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, छोटा नागपुर आदि स्थानों पर यह वृक्ष विशेष रूप से पैदा होता है।
- इसके पत्तों से पत्तल भी बनाई जाती है।
- इस वृक्ष के फल से निकाली गई गुठली को मींगी कहते हैं।
- चारोली बादाम की प्रतिनिधि मानी जाती है। जहाँ बादाम न मिल सकें वहाँ चारोली का प्रयोग किया जा सकता है।
- चारोली स्वाद में मधुर, स्निग्ध, भारी, शीतल एवं हृद्य (हृदय को रुचने वाली) है। देह का रंग सुधारने वाली, बलवर्धक, वायु-दर्दनाशक एवं शिरःशूल को मिटाने वाली है।
- यह मधुर बल वीर्यवर्द्धक, हृदय के लिए उत्तम, स्निग्ध, विष्टंभी, वात पित्त शामक तथा आमवर्द्धक होती है।
- इसका सेवन रूग्णावस्था और शारीरिक दुर्बलता में किया जाता है।
- चारोली का पका हुआ फल भारी होने के साथ-साथ मधुर, स्निग्ध, शीतवीर्य तथा दस्तावार और वात पित्त, जलन, प्यास और ज्वर का शमन करने वाला होता है।

- चिरौंजी कफ को दस्त द्वारा बाहर निकाल देता है।
- शहद चिरौंजी के दोषों को दूर कर इसके गुणों को सुरक्षित रखता है।
- इस वृक्ष के फल की गुठली से निकली मींगी और छाल दोनों उपयोगी होती है।
- चिरौंजी का उपयोग अधिकतर मिठाई में जैसे हलवा, लड्डू, खीर, पाक आदि में सूखे मेवों के रूप में किया जाता है।
- सौंदर्य प्रसाधनों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
- मुँहासे- नारंगी और चारोली के छिलकों को दूध के साथ पीस कर इसका लेप तैयार कर लें और चेहरे पर लगाए। इसे अच्छी तरह सूखने दें और फिर खूब मसल कर चेहरे को धो लें। इससे चेहरे के मुँहासे गायब हो जाएँगे। अगर एक हफ्ते तक प्रयोग के बाद भी असर न दिखाई दे तो लाभ होने तक इसका प्रयोग जारी रखें।
- गीली खुजली - गीली खुजली में 10 ग्राम सुहागा पिसा हुआ, 100 ग्राम चारोली, 10 ग्राम गुलाब जल इन तीनों को साथ में पीसकर इसका पतला लेप तैयार करें और खुजली वाले सभी स्थानों पर लगाते रहें। ऐसा करीबन 4-5 दिन करें। इससे खुजली में काफी आराम मिलेगा।
- चेहरे पर लेप- चारोली को गुलाब जल के साथ सिलबट्टे पर महीन पीस कर लेप तैयार कर चेहरे पर लगाएँ। लेप जब सूखने लगे तब उसे अच्छी तरह मसलें और बाद में चेहरा धो लें। इससे चेहरा चिकना, सुंदर और चमकदार हो जाएगा। इसे एक सप्ताह तक हर रोज प्रयोग में लाए। बाद में सप्ताह में दो बार लगाते रहें।
- ददोड़े/शीत पित्ती- शरीर पर शीत पित्ती के ददोड़े या फुंसियाँ होने पर दिन में एक बार 20 ग्राम चिरौंजी को खूब चबा कर खाएँ। साथ ही दूध में चारोली को पीसकर इसका लेप करें। इससे बहुत फायदा होगा। यह नुस्खा शीत पित्ती में बहुत उपयोगी है।
- चारोली का तेल बालों को काला करने के लिए उपयोगी है।

- 5-10 ग्राम चारोली को पीसकर दूध के साथ लेने से रक्तातिसार (खूनी दस्त) में लाभ होता है।
- खांसी में चिरौंजी का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से लाभ मिलता है।
- छठवें महीने के गर्भाशय के रोग: चिरौंजी, मुनक्का और धान की खीलों का सत्तू, ठण्डे पानी में मिलाकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से गर्भ का दर्द, गर्भस्राव आदि रोगों का निवारण हो जाता है।

 सिरके का आयुर्वेद में प्रयोग ---


- सिरका कई प्रकार का होता है।अंगूर, सेब, संतरे, अनन्नास, जामुन तथा अन्य फलों के रस, जिनमें शर्करा पर्याप्त है, सिरका बनाने के लिए बहुत उपयुक्त हैं क्योंकि उनमें जीवाणुओं के लिए पोषण पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होते हैं।
- आयुर्वेद में सिरके का प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता है। आप अपने बालों को सुंदर बनाने के लिए भी सिरके का प्रयोग कर सकते हैं। सिरका बालों के लिए अच्छा है । डेंड्रफ, जूं जैसी समस्याओं से बचने के लिए सिरके का प्रयोग लाभकारी हैबालों की अच्छी तरह से सफाई और बालों को स्व्स्थ रखने में सिरके का इस्तेमाल किया जाता है। बालों की कंडीशनिंग के लिए भी सिरके का इस्तेमाल किया जा सकता है।

- बालों में होने वाले फुंसी, फंगस और इसी तरह की अन्य समस्याओं को दूर करने और बैक्टीरिया इत्यादि को नष्ट करने में भी सिरके का प्रयोग किया जाता है।

- बालों की चमक बरकरार रखने के लिए और बालों को मुलायम और सुंदर बनाने के लिए सिरके से किफायती कुछ भी नहीं।


- सिरके से बालों को सीधा भी किया जा सकता है। यदि रूखे और घुंघराले बालों को सीधा करना है तो सिरके का प्रयोग करना चाहिए। ऐसे में आपको चाहिए कि आप सेब के सिरके से बालों को धोएं और इससे जल्द ही आप बाल सीधे कर पाएंगे।

- भोजन के साथ सिरका खाने से रक्त पतला होता है।

- सिरका, चर्बी कम करने और शरीर से विषैले पदार्थ निकालने की प्रक्रिया में सहायक होता है तथा इससे रक्त से वसा और हानिकारक कोलिस्ट्रोल कम होता है।

- सिरका बुद्धि में तीव्रता का कारण बनता है और ह्रदय के लिए लाभदायक होता है।

- सिरके में मौजूद सेट्रिक एसिड आहार में मौजूद कैल्शियम को शरीर का अंश बनाता है और शरीर की भीतरी क्रियाओं के लिए अत्याधिक लाभदायक होता है।


- सिरका, पाचनक्रिया के लिए हानिकारिक बैक्र्टिरिया का नाश करता है। जिन लोगों को पाचनतंत्र की समस्या और क़ब्ज़ तथा दस्त अथवा पेट दर्द में ग्रस्त हैं वह सिरका की सहायता से इन समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं।

- सिरके का एक अन्य लाभ यह है कि वह अमाशय की एसिड के स्राव को संतुलित करता है ।

- सिरका दांतों की गंदगी दूर करने और मसूड़े की सूजन में लाभदायक है।

- डाक्टर, कमज़ोर स्नायुतंत्र, गठिया और अल्सर के रोगियों के लिए सिरके को हानिकारक बताते हैं।

- जामुन का सिरका पेट सम्बंधी रोगों के लिए लाभकारक है। जामुन के सिरके से भूख बढ़ती है, पेट की वायु निकलती है , कब्ज दूर होती है व मूत्र साफ होता है।काले पके हुए जामुन साफ धो कर पोछ कर मिटटी के बर्तन में नामक मिलाकर साफ कपडे से बांध कर धुप में रख दे । एक सप्ताह धुप में रखने के पश्चात् इसको साफ कपडे से छान कर रस को कांच के बोतल में भर कर रख दे यह सिरका तैयार है । मुली प्याज गाजर शलजम मिर्च आदि के टुकडे भी उसी सिरके में डालकर इसका उपयोग सलाद पर आसानी से किया जा सकता है ।

- किसी ने धतूरा खा लिया हो, तो उसे अंगूर का सिरका दूध में मिलाकर पिलाने से काफी लाभ होता है।

- एक प्याले में सेब का सिरका, एक कप शहद और छिले हुए लहसुन की आठ गाँठे मिलाओ। इन सबको तेज चलने वाली मिक्सी में डाल कर एक मिनट के लिए चला दो और घोल तैयार करो। इस मिश्रण को एक काँच की बोतल में डाल कर पाँच दिन के लिए फ्रिज में बन्द करके रखो। आम खुराक -दो चम्मच पानी या अंगूर या फलों के रस में डाल कर नाश्ते से पहले लो। इस इलाज से बंद नाड़ियों, जोड़ों का दर्द, उच्च रक्तचाप ( हाई ब्लड प्रैशर), कैंसर की कुछ किस्मों, कोलेस्टरोल की अधिक मात्रा, सर्दी ज़ुकाम, बदहज़मी, सिर दर्द, दिल के रोग, रक्त प्रवाह की समस्या, बवासीर, बांझपन, नपुसंकता, दांत दर्द, मोटापा, अल्सर और बहुत सारी बीमारियाँ ठीक करने में सहायता मिलती है।

- एसीडिटी से निजात पाने के लिए एक ग्लास पानी में दो चम्मच सेब का सिरका तथा दो चम्मच शहद मिलाकर खाने से पहले सेवन करें।

- हृदय रोग, कैलोस्ट्रोल बढ़ने और खून के थक्के होने की शिकायत है, उनके लिए अनुभूत औषधि जो बरसों पहले एक वृद्ध साधू द्वारा बताई गयी है.अदरक का रस एक कप, लहसून का रस एक कप, नीम्बू का रस एक कप, सेब का सिरका एक कप लेकर, उसको मध्यम आंच पर गर्म करे. जब तीन कप रह जाएँ, तो उसको सामान्य तापमान तक ठंडा कर लें . फिर उसमें तीन कप शहद मिला कर, किसी भी बोतल आदि में रख लें. रोज़ प्रात: खाली पेट, दो चम्मच औषधि को सामान मात्रा में जल मिलाकर, सेवन करें.नाश्ता लगभग आधे घंटे बाद करें.

पेठे के गुण


* पेठा या कुम्हडा व्रत में भी लिया जा सकता है .
* आयुर्वेद ग्रंथों में पेठे को बहुत उपयोगी माना गया है। यह पुष्टिकारक, वीर्यवर्ध्दक, भारी, रक्तदोष तथा वात-पित्त को नष्ट करने वाला है।
* कच्चा पेठा पित्त को समाप्त करता है लेकिन जो पेठा अधिक कच्चा भी न हो और अधिक पका भी न हो, वह कफ पैदा करता है किन्तु पका हुआ पेठा बहुत ठंडा, ग्राही, स्वाद खारी, अग्नि बढ़ाने वाला, हल्का, मूत्राशय को शुध्द करने वाला तथा शरीर के सारे दोष दूर करता है।
* यह मानसिक रोगों में जैसे मिरगी, पागलपन आदि में तो बहुत लाभ पहुंचाता है।लपन आदि में तो बहुत लाभ पहुंचाता है। मानसिक कमजोरी-मानसिक विकारों में विशेषकर याद्दाश्त की कमजोरी में पेठा बहुत उपयोगी रहता है। ऐसे रोगी को 10-20 ग्राम गूदा खाना चाहिए अथवा पेठे का रस पीना चाहिए।
* शरीर में जलन-पेठे के गूदे तथा पत्तों की लुगदी बनाकर लेप करें। साथ-साथ बीजों को पीसकर ठंडाई बनाकर प्रयोग करें। इससे बहुत लाभ होगा।
* नकसीर फूटना- पेठे का रस पीएं या गूदा खाएं। सिर पर इसके बीजों का तेल लगाएं। बहुत लाभ होगा।
* दमा रोग – दमे के रोगियों को पेठा अवश्य खिलाएं। इससे फेफड़ों को शांति मिलती है।

खांसी तथा बुखार- पेठा खाने से खांसी तथा बुखार रोग भी ठीक होते हैं।

* पेशाब के रोग- पेठे का गूदा तथा बीज मूत्र विकारों में बहुत उपयोगी है। यदि मूत्र रूक-रूककर आता हो अथवा पथरी बन गई हो तो पेठा तथा उसके बीज दोनों का प्रयोग करें। लाभ होगा।
* वीर्य का कमी- इस रोग में पेठे का सेवन अति उपयोगी है।
* कब्ज तथा बवासीर-पेठे के सेवन से कब्ज दूर होती है। इसी कारण बवासीर के रोगियों के लिए यह बहुत लाभकारी है। इससे बवासीर में रक्त निकलना भी बंद हो जाता है।
भूख न लगना- जिन लोगों की आंतों में सूजन आ गई है, भूख नहीं लगती, वे सुबह दो कप पेठे का रस पीएं। भूख लगने लगेगी और आंतों की सूजन भी ठीक हो जाएगी।
* खाली पेट पेठा खाने से शारीर में लचीलापन और स्फूर्ति बनी रहती है .

 शहद(honey ) का सेवन करने के नियम

शहद कभी खराब नहीं होता . यह पका पकाया भोजन है और तुरंत ऊर्जा देने वाला है . पर इसे लेते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए .
- अमरुद , गाना , अंगूर और खट्टे फलों के साथ शहद अमृत के सामान है .
- चाय कॉफ़ी के साथ शहद ज़हर के सामान है .
- शहद को आग पर कभी ना तपाये .
- मांस -मछली के साथ शहद का सेवन ज़हर के सामान है .
- शहद में पानी या दूध बराबर मात्रा में हानि कारक है .
- चीनी के साथ शहद मिलाना अमृत में ज़हर मिलाने के सामान है .
- एक साथ अधिक मात्रा में शहद लेना
सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है .दिन में २ या ३ बार एक चम्मच शहद लें .
- घी , तेल , मक्खन में शहद ज़हर के सामान है .
- शहद खाने से कोई परेशानी महसूस हो तो निम्बू का सेवन करें .
- समान मात्रा में घी और शहद ज़हर होता है .
- अलग अलग वृक्षों पर लगे छत्तों में प्राप्त शहद के अलग अलग औषधीय गुण होंगे . जैसे नीम पर लगा शहद आँखों के लिए , जामुन का डायबिटीज़ और सहजन का ह्रदय , वात और रक्तचाप के लिए अच्छा होता है
.
- शीतकाल या बसंतऋतु में विकसित वनस्पति के रस में से बना हुआ शहद उत्तम होता है और गरमी या बरसात में एकत्रित किया हुआ शहद इतना अच्छा नही होता है। गांव या नगर में मुहल्लों में बने हुए शहद के छत्तों की तुलना में वनों में बनें हुए छत्तों का शहद अधिक उत्तम माना जाता है।
- शहद पैदा करनें वाली मधुमक्खियों के भेद के अनुसार वनस्पतियों की विविधता के कारण शहद के गुण, स्वाद और रंग में अंतर पड़ता है।
- शहद सेवन करने के बाद गरम पानी भी नहीं पीना चाहिए।
- मोटापा दूर करने के लिए गुनगुने पानी में और दुबलापन दूर करने के लिए गुनगुने दूध के साथ ले .
- अधिक धुप में शहद ना दे . गरमी से पीड़ित व्यक्ति को गरम ऋतु में दिया हुआ शहद जहर की तरह कार्य करता है।
- शहद को जिस चीज के साथ लिया जाये उसी तरह के असर शहद में दिखाई देते है। जैसे गर्म चीज के साथ लें तो- गर्म प्रभाव और ठंडी चीज के साथ लेने से ठंडा असर दिखाई देता है। इसलिए मौसम के अनुसार वस्तुएं शहद के साथ ले .
- ज्यादा मात्रा में शहद का सेवन करने से ज्यादा हानि होती है। इससे पेट में आमातिसार रोग पैदा हो जाता है और ज्यादा कष्ट देता है। इसका इलाज ज्यादा कठिन है। फिर भी यदि शहद के सेवन से कोई कठिनाई हो तो 1 ग्राम धनिया का चूर्ण सेवन करके ऊपर से बीस ग्राम अनार का सिरका पी लेना चाहिए।बच्चे बीस से पच्चीस ग्राम और बड़े चालीस से पचास ग्राम से अधिक शहद एक बार में न सेवन करें। लम्बे समय तक अधिक मात्रा
में शहद का सेवन न करें।
- चढ़ते हुए बुखार में दूध, घी, शहद का सेवन जहर के तरह है। यदि किसी व्यक्ति ने जहर या विषाक्त पदार्थ का सेवन कर लिया हो उसे शहद खिलाने से जहर का प्रकोप एक-दम बढ़कर मौत तक हो सकती है।

 पीपल 

- यह 24 घंटे ऑक्सीजन देता है .
- इसके पत्तों से जो दूध निकलता है उसे आँख में लगाने से आँख का दर्द ठीक हो जाता है .
- पीपल की ताज़ी डंडी दातून के लिए बहुत अच्छी है .
- पीपल के ताज़े पत्तों का रस नाक में टपकाने से नकसीर में आराम मिलता है .
- हाथ -पाँव फटने पर पीपल के पत्तों का रस या दूध लगाए .
- पीपल की छाल को घिसकर लगाने से फोड़े फुंसी और घाव और जलने से हुए घाव भी ठीक हो जाते है .
- सांप काटने पर अगर चिकित्सक उपलब्ध ना हो तो पीपल के पत्तों का रस 2-2 चम्मच ३-४ बार पिलायें
.विष का प्रभाव कम होगा .
- इसके फलों का चूर्ण लेने से बांझपन दूर होता है और पौरुष में वृद्धि होती है .
- पीलिया होने पर इसके ३-४ नए पत्तों के रस का मिश्री मिलाकर शरबत पिलायें .३-५ दिन तक दिन में दो बार दे .
- कुक्कुर खांसी में छाल का 40 मी ली. काढा दिन में तीन बार पिलाने से लाभ होता है .
- इसके पके फलों के चूर्ण का शहद के साथ सेवन करने से हकलाहट दूर होती है और वाणी में सुधार होता है .
- इसके फलों का चूर्ण और छाल सम भाग में लेने से दमा में लाभ होता है .
- इसके फल और पत्तों का रस मृदु विरेचक है और बद्धकोष्ठता को दूर करता है .
- यह रक्त पित्त नाशक , रक्त शोधक , सुजन मिटाने वाला ,शीतल और रंग निखारने वाला है .

  गोंद के औषधीय गुण -


किसी पेड़ के तने को चीरा लगाने पर उसमे से जो स्त्राव निकलता है वह सूखने पर भूरा और कडा हो जाता है उसे गोंद कहते है .यह शीतल और पौष्टिक होता है . उसमे उस पेड़ के ही औषधीय गुण भी होते है . आयुर्वेदिक दवाइयों में गोली या वटी बनाने के लिए भी पावडर की बाइंडिंग के लिए गोंद का इस्तेमाल होता है .
- कीकर या बबूल का गोंद पौष्टिक होता है .
- नीम का गोंद रक्त की गति बढ़ाने वाला, स्फूर्तिदायक पदार्थ है।इसे ईस्ट इंडिया गम भी कहते है . इसमें भी नीम के औषधीय गुण होते है 
पलाश के गोंद से हड्डियां मज़बूत होती है .पलाश का 1 से 3 ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध अथवा आँवले के रस के साथ लेने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं और शरीर पुष्ट होता है।यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है।
- आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नीबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है।
- सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है, यह पित्त का शमन करता है।अतिसार में मोचरस चूर्ण एक से तीन ग्राम को दही के साथ प्रयोग करते हैं। श्वेतप्रदर में इसका चूर्ण समान भाग चीनी मिलाकर प्रयोग करना लाभकारी होता है। दंत मंजन में मोचरस का प्रयोग किया जाता है।
- बारिश के मौसम के बाद कबीट के पेड़ से गोंद निकलती है जो गुणवत्ता में बबूल की गोंद के समकक्ष होती है।

- हिंग भी एक गोंद है जो फेरूला कुल (अम्बेलीफेरी, दूसरा नाम एपिएसी) के तीन पौधों की जड़ों से निकलने वाला यह सुगंधित गोंद रेज़िननुमा होता है । फेरूला कुल में ही गाजर भी आती है । हींग दो किस्म की होती है - एक पानी में घुलनशील होती है जबकि दूसरी तेल में । किसान पौधे के आसपास की मिट्टी हटाकर उसकी मोटी गाजरनुमा जड़ के ऊपरी हिस्से में एक चीरा लगा देते हैं । इस चीरे लगे स्थान से अगले करीब तीन महीनों तक एक दूधिया रेज़िन निकलता रहता है । इस अवधि में लगभग एक किलोग्राम रेज़िन निकलता है । हवा के संपर्क में आकर यह सख्त हो जाता है कत्थई पड़ने लगता है ।यदि सिंचाई की नाली में हींग की एक थैली रख दें, तो खेतों में सब्ज़ियों की वृद्धि अच्छी होती है और वे संक्रमण मुक्त रहती है । पानी में हींग मिलाने से इल्लियों का सफाया हो जाता है और इससे पौधों की वृद्धि बढ़िया होती

- गुग्गुल एक बहुवर्षी झाड़ीनुमा वृक्ष है जिसके तने व शाखाओं से गोंद निकलता है, जो सगंध, गाढ़ा तथा अनेक वर्ण वाला होता है. यह जोड़ों के दर्द के निवारण और धुप अगरबत्ती आदि में इस्तेमाल होता है .

- प्रपोलीश- यह पौधों द्धारा श्रावित गोंद है जो मधुमक्खियॉं पौधों से इकट्ठा करती है इसका उपयोग डेन्डानसैम्बू बनाने में तथा पराबैंगनी किरणों से बचने के रूप में किया जाता है।
- ग्वार फली के बीज में ग्लैक्टोमेनन नामक गोंद होता है .ग्वार से प्राप्त गम का उपयोग दूध से बने पदार्थों जैसे आइसक्रीम , पनीर आदि में किया जाता है। इसके साथ ही अन्य कई व्यंजनों में भी इसका प्रयोग किया जाता है.ग्वार के बीजों से बनाया जाने वाला पेस्ट भोजन, औषधीय उपयोग के साथ ही अनेक उद्योगों में भी काम आता है
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- इसके अलावा सहजन , बेर , पीपल , अर्जुन आदि पेड़ों के गोंद में उसके औषधीय गुण मौजूद होते है .